रेवांचल टाईम्स - कितने बरस बीत गए, विज्ञान ने कितनी उन्नति कर ली , आदमी मंगल, बृहस्पति, चन्द्रमा तक पंहुचने की तैयारी में है अंतरिक्ष के चक्कर काट काट के वापस आ गया है लेकिन डेढ़ इंच के मच्छरों को वो आज भी ख़तम नहीं कर पाया l मच्छर को मारने के लिए तरह तरह के जतन करता है आदमी, कोई "कछुआ" छाप अगरबत्ती जलाता है तो कोई "ऑल आउट" लगाता है कोई "मच्छरदानी" लगा लेता है तो कोई "नीम के पत्तों" का धुंआ करता फिरता है कोई"मच्छर मार अगरबत्ती" से उनका मुकाबला करता है तो कोई मच्छर मारने वाले "रेकिट" की मदद से मच्छरों का खात्मा करने के लिए मोर्चे पर डट जाता है, लेकिन मच्छर हैं कि मानते नहीं,एक मारो चार और आ जाते हैं l लोग बाग़ कहते हैं कि आखिर ये मच्छर आते कहाँ से हैं तो भैया ये नगर निगम काहे के लिए हैं इन्हें पाल पोसकर बड़ा करने में नगर निगमों का भारी रोल काल है, शहर में बनी नालियां बजबजाती रहती हैं, गंदगी हर चौराहे, हर मोहल्ले में पड़ी दिखाई देती है बरसात में सड़कों पर डबरे भरे रहते है ये ही तो मच्छरों के जन्म दाता है सो वे जन्म ले लेते हैं, लेकिन अब स्वीडन की कंपनी "मोलिकलूर अट्रेक्शन" ने एक प्रयोग बतलाया है और इस प्रयोग के लिए पहले मच्छरों को "जूस"पीने का न्योता देना पड़ेगा कि भैया मच्छरों हमने आपके लिए बेहतरीन चुकंदर का जूस बना कर रखा है आओ और जी भर कर पियो,कंपनी का कहना है को ऐसे लोग जो मलेरिया से पीडित हैं उनके खून में एक तरह का मॉलिक्यूल पाया जाता है यह मॉलिक्यूल खास तरह की गंध छोड़ता है इससे मच्छर आकर्षित होते है और खून चूसने आ जाते हैं, कंपनी का कहना है कि इस मॉलिक्यूल को चुकंदर के जूस में जहर मिला कर रखना पडेगा मच्छर उससे आकर्षित होंगे और चुकंदर के जहर मिले जूस को पीने के बाद मच्छर हमेशा के लिए लंब लेट हो जाएंगें यानि पहले चुकंदर लाओं फिर उसका जूस बनाओ उसमें मॉलिक्यूल और जहर मिलाओ और उसे कमरे में रख दो , मच्छर आएंगे और उस चुकंदर के जूस को खून समझ आकर पी लेंगे और देखते ही देखते वे स्वर्गवासी हो जाएंगे l ये स्वीडन वाले मच्छरों को क्या बेबकूफ समझते हैं ये कलियुग के मच्छर हैं इंसान का खून पीते पीते वे "धोखाधड़ी" ,"चालबाजी" "फरेब" इन सबसे अच्छी तरह से वाकिफ हो गए हैं क्या वे नहीं समझेंगे कि जिस छह फुट के आदमी का खून हम लोग चूसते थे उसने अपना खून ग्लास में कैसे रखा है, अपना तो मानना है कि वे उस जूस की तरफ झांकेंगे भी नहीं, वे भी आदमी की फितरत जानते है उनको इस बात का भी ज्ञान हो गया हैं कि "लालच बुरी बलाय" होती है अभी देखा नहीं जबलपुर के भेड़ाघाट के पंचवटी में जो मगरमच्छ कँही से आ गया था मुर्गा खाने के लालच में वन विभाग के पिंजड़े में फंस गयाl ये सारी खबरे उनके पास हैं इसलिए वे इन झटको लटकों में नहीं फंसने वाले, वैसे भी चुकंदर कौन सा सस्ता है एक किलो चुकंदर में जूस भी आखिर कितना निकलेगा l मछरों को इतना मूर्ख समझ रहे है ये स्वीडन वाले, इन मच्छरों की जिंदगी हो गयी आदमियों का खून चूसते चूसते और अभी तक तो वे गंदे पानी में पनपते थे लेकिन आज कल उन्होंने अपना "जन्म स्थान" बदल लिया है वे साफ़ पानी में पनपने लगे है और डेंगू फैला रहे हैं पहले उनके पास केवल "मलेरिया" का चार्ज था की अब डेंगू का कार्यभार भी उन्होंने संभाल लिया है इसलिए स्वीडन वालो और कोई उपाय ढूंढो आपकी स्कीम से मच्छरों का कुछ नहीं बिगड़ने वाला वे अमर थे, अमर हैं, और अमर रहेंगे l
प्रायमरी के बच्चे बन गए आईएएस अफसर
आजकल अपने प्रदेश यानि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह यानि मामाजी अपने फुल फार्म में है पुलिस कमिश्नर प्रणाली जो बीस साल से लटकी पडी थी, मामाजी ने एक ही झटके में उसे लागू कर दिया, रात भर में ड्राफ्ट भी बन गया पास भी हो गया और इंदौर और भोपाल में पुलिस कमिश्नरों की नियुक्ति भी हो गयी l इधर पुलिस कमिश्नर बन जाने से कलेक्टरों के अधिकार कम हो गए,बहुत से अधिकार पुलिस कमिशनर के पास आ गए ऊपर से मामाजी कलेक्टरों की बैठक लेकर उनके रिपोर्ट कार्ड जारी कर रहे हैं जैसे प्रायमरी के बच्चे अपनी अपनी मार्कशीट और परीक्षा का रिपोर्ट कार्ड एक दूसरे को दिखाते फिरते है वैसा ही हाल इन अफसरों का हो गया है ,मामाजी उनके परफॉर्मेंस के हिसाब से उनको नंबर दे रहे है कोई "फर्स्ट डिवीजन"आ रहा है तो कोई "सेकण्ड डिवीज़न", कोई "थर्ड डिवीज़न"में पास हो रहा है तो किसी को "सप्लीमेंट्री"मिल रही है कोई "ग्रेस" पाकर पास हो रहा है यानि मामाजी हो गए है हेड मास्टर और ये अफसर विद्यार्थी l चलो नम्बर कम होने तक तो ठीक था लेकिन मामाजी एक ही झटके में कलेक्टरों को जिले से हटाकर सचिवालय में अटैच करने में वक्त नहीं लगा रहे हैं ,मामाजी जिस तरह से परीक्षा ले रहे है उसमें नक़ल करने की भी गुंजाइश नहीं है न पर्ची काम आ रही हैं गैस पेपर,न तो पेपर आउट हो पा रहे हैं न ही इंपोर्टेंट क्वेशचन पता लग पा रहे हैं अब बेचारे कलेक्टर करें भी तो करें क्या,इतनी मेहनत तो आईएएस बनने के लिए नहीं की थी जितनी अब करना पड़ रही है,बेचारे अपना रिपोर्ट कार्ड देखते हैं और अपना बोरिया बिस्तर बांध लेते हैं कि पता नहीं कब भोपाल जाना पड़ जाये कह नहीं सकते, वैसे एक बात तो है अभी तक आईएएस अफसर मामाजी की सरकार को चलाते थे अब मामाजी इन आईएएस अफसरों को चला रहे हैं किसी ने सच ही कहा है कभी "नाव पानी पर तो कभी पानी नाव पर" l
सुपर हिट ऑफ़ द वीक
"मंगल सूत्र के बारे में आप क्या सोचते हैं" किसी ने श्रीमान जी से पूछा
"मंगल सूत्र पहनाने के बाद मंगल पति के पीछे लग जाता है और सारे सूत्र बीबी के हाथ में चले जाते हैं" श्रीमान जी ने उत्तर दिया l
चैतन्य भट्ट
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